भाजपा की जीत का राज, अमित शाह की रणनीति या ईवीएम मशीन की गणनीति

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नई दिल्ली: यूपी चुनावों को लेकर ईवीएम मशीन में गड़बड़ी का आरोप है उस पर विपक्ष जांच की मांग कर रहा है। बीएसपी सुप्रीमो ने प्रेस कॉफ्रेंस बुलाकर आरोप लगाया है की जिस तरह के नतीजे आये है उनसे जाहिर है की ईवीएम मशीन के साथ छेड़खानी हुई है। मायावती के इस आरोप का अखिलेश यादव ने भी समर्थन किया और जांच की मांग की है।

क्या है आरोप की वजह

दरअसल काफी दिनों से सोशल मीडिया पर एक जोक वायरल हो रहा है “कोई भी बटन दबाओ कमल का ही वोट जाएगा” और फिर चुनावों के नतीजे भी इस कदर आये की विपक्ष हैरान रह गया। यही वजह है की ईवीएम मशीन में गड़बड़ी का मुद्दा बीजेपी की जीत के कारणों में सबसे अहम मुद्दा बना हुआ है।

क्या ईवीएम मशीन में गड़बड़ी की संभव है

इस सवाल का जवाब जानने से पहले हमे जान लेना चाहिये की ईवीएम मशीन क्या है। EVM मशीन एक इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन कंट्रोल यूनिट है जो केबल से बैलट यूनिट से जुडी होती है जिसको 6 वोल्ट की बैटरी से चलाया जाता है। एक बार बटन दबाने के बाद, मशीन स्वतः लॉक हो जाती है। एक वोट के बाद दुसरे वोट के लिए मशीन सिर्फ नए बैलट नंबर से ही खुल सकती है। जिसमे एक मिनट में सिर्फ 5 वोट ही दिए जा सकते हैं। ईवीएम मशीनें बैलट बॉक्स के मुकाबले आसान मानी जाती हैं, उनकी स्टोरेज, गणना बाकि सब कुछ ज्यादा आसान है। लेकिन जानकारों का मानना है कि ईवीएम मशीनें काफी असुरक्षित होती हैं।

ईवीएम मशीनों में गड़बड़ी करना कोई नामुमकिन काम नहीं है और न ही आज के जमाने में किसी पार्टी से इतने सदाचारी होने की उम्मीद की जा सकती कि इसे मौका मिलेगा और वो ईवीएम मशीन में गड़बड़ी से चूक जाए। कुछ सालों पहले यह साबित हो चुका है कि एक छोटा सा मॉलवेयर वायरस ईवीएम मशीन में इनस्टॉल किया जा सकता है और मॉलवेयर के प्रोग्राम फॉर्मूले के अनुसार वोटों में हेर फेर कर सकता है।

संभावना कुछ भी हो सकती है लेकिन भाजपा की जीत का मुख्य क्रेडिट अमित शाह की रणनीति को मिलता है।

क्या थी अमित शाह की रणनीति

  • यूपी में मुसलमानों को बहुमत बहुत अधिक है अगर उनका बहुमत किसी एक पार्टी को जाता तो उसकी जीत निश्चित है। यूपी में मुसलमान मतदाताओं में भ्रम की स्थिति पैदा करने के लिए बीएसपी के उभार होने और उसके पक्ष में अंडर करंट होने की अफवाहें फैलाई गईं। इसका नतीजा ये हुआ कि मुस्लिम मतदाताओं के मुस्लिम बहुल सीटों पर वोट टूट गये। कुछ मुसलमानों ने बीएसपी को वोट दिया तो कुछ ने एसपी को, अमित शाह का काम आसान करने के लिए कुछ उलेमाओं ने फतवे जारी किए और ओवैसी लोग भी यूपी में डेरा डालकर बैठ गए।
  • दलितों वोटरों को बांटने का भी जबरदस्त काम हुआ। चुनावी प्रचार के दौरान कम से कम 4-5 जगह अंबेडकर की मूर्तियों को क्षति पहुंचाई गईं जिससे दलित वर्ग आग बबूला हो गया। ज्यादातर मामलों में सवर्णों नहीं बल्कि पिछड़ों पर आरोप लगाया गया। हमले उन जगहों पर हुए जहां बीजेपी का स्ट्रांग होल्ड था या फिर बीजेपी की सरकार वाला राज्य था। इससे दलित वर्ग समाजवादी पार्टी से अलग हो गया।
  • हिंदू वोटों का ध्रुवीकरण करने के लिए अमितशाह ने आखिरी वक्त तक कई हथकंडे अपनाए। राहुल गांधी को मुसलमान बताने वाले मैसेज लगातार फॉर्वर्ड किए गए। इन मैसेज में फिरोज गांधी को पारसी की जगह मुसलमान बताया जा रहा था। बीजेपी और संघ के कार्यकर्ताओं ने कहा कि दोनों हिंदुओं के दुश्मन मिल गए हैं। समाजवादी पार्टी हिंदुओं पर गोली चलवाती है और राहुल गांधी मुसलमान है। इसलिए इन्हें वोट नहीं देना चाहिये।
  • राज्य में सांप्रदायिक तनाव की कोशिश भी की गई। कई जगह गाय के कटे सिर वाले फोटो वाट्सएप पर वायरल किये गये और कहा गया कि मुसलमानों को ठीक एक ही आदमी कर सकता है इसलिए हिंदू बीजेपी को वोट दें। श्मशान और कब्रिस्तान वाला मुद्दा बीजेपी ने उठाया। दिवाली और ईद का मुद्दा भी बीजेपी ने जानबूझ कर उछाला।

ये कुछ ऐसे कारण थे जिन की काट संभव ही नहीं थी। दूसरी तरफ प्रदेश के लोगों की नजर में मायावती की इमेज सीटें नीलाम करने या फिर बिल्डर लॉबी से मोटी रकम वसूलने वाली नेता की थी। कहा जाता था कि वो कोई भी काम तबतक नहीं होने देतीं जबतक उनके पास मोटे पैसे न पहुंच जाएं। समाजवादी पार्टी की इमेज रेत माफिया, जमीन हड़पने वाले गुंडों और दबंगों की पार्टी की थी। बीजेपी ने महिलाओं की इज्जत की बात करके कानून व्यवस्था का मसला खूब उठाया इससे पार्टी को महिलाओं की सहानुभूति मिली।

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